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हमारा देश कृषि प्रधान देश है जिसमें अधिकांश लोग खेती द्वारा अर्जित आय से ही गुजारा कर रहे हैं परन्तु आजकल की बढ़ती महंगाई के दौर में सिर्फ खेती पर निर्भर रह कर गुजारा करना कठिन हो गया है। अत: अपने परिवार के आर्थिक व सामाजिक स्तर को ऊॅंचा उठाने व बच्चों को उचित शिक्षा दिलाने के लिए ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाकर कुछ ऐसे व्यवसायों को अपनाना होगा जिससे वह अपने परिवार की आय बढ़ाने के साथ-साथ खाली समय का भी सदुपयोग कर सकें।

     आय उपार्जन के कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिसमें विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है परन्तु कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनको प्रशिक्षण लेकर ही शुरू किया जा सकता है। आइए हम आपको कुछ ऐसे व्यवसायों से अवगत कराते हैं जिनको अपना कर स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं अपने परिवार की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्वावलंबी भी बन सकती हैं।

1.    फल एवं सब्जी परिरक्षण : फलों एवं सब्जियों का हमारे दैनिक आहार में महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक फल व सब्जी हर मौसम में नहीं मिलती अत: हम इनको अचार, मुरब्बा, जैम, स्क्वैश, जैली इत्यादि बनाकर परिरक्षित कर सकते हैं ताकि बेमौसम में इनका आनन्द उठाया जा सके। इसे व्यवसा के रूप में अपनाकर महिलाएं काफी लाभ कमा सकती हैं। घर पर बनाए गए पदार्थ काफी सस्ते पड़ते हैं। महिलाएं इनसे तकरीबन दुगुना लाभ उठा सकती हैं। शुरू में आप इसे छोटे स्तर पर आरंभ कर सकती हैं व धीरे-धीरे इसका विस्तार करके काफी लाभ कमा सकती हैं व आय उपार्जन का उत्ताम स्त्रोत बन सकती हैं।

 

2.    साबुन व सर्फ इत्यादि बनाना : साबुन व सर्फ को आय उपार्जन के रूप में अपनाने के लिए अधिक धन की आवश्यकता नहीं होती। अत: महिलाआें को चाहिए कि वह न केवल अपने परिवार की जरूरत के लिए ही इसे घर पर बनाएं बल्कि लघु उद्योग के रूप में अपनाकर आया उपार्जन का साधन बनाएं।

3.    मसाला पीसना व पैक करना : इस उद्योग को आय उपार्जन के रूप में अपनाने के लिए बिजली द्वारा संचालित चक्की व पैकिंग मशीन की जरूरत होती है। महिलाएं मसालों को साफ करके, पीसकर तथा पैक करके दुकानदारों एवं आस-पड़ोस के घरों में अपने माल की सप्लाई कर सकती हैं।

4.    साधारण रंगाई व बंधेज द्वारा रंगाई : रंगाई व बंधेज के कार्य को महिलाएं 5-7 दिन के प्रशिक्षण के बाद व्यवसाय के रूप में अपना सकती हैं। बंधेज का अधिक प्रचलन होने के कारण महिलाएं इससे अच्छा लाभ कमा सकती हैं।

5.    पापड़ व बड़ियां बनान : इस व्यवसाय को चार-पांच महिलाएं मिलकर आरम्भ कर सकती हैं। अपने द्वारा बनाई गई सामग्री को वह दुकानों व घरों इत्यादि में सप्लाई कर सकती हैं।

6.    चाकबत्ताी व मोमबत्ताी बनाना : एक सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद महिलाएं चाकबत्ताी व मोमबत्ताी के व्यवसाय को लघु उद्योग के रूप में अपनाकर अच्छा लाभ कमा सकती हैं।

7.    कढ़ाई व बुनाई : आजकर सलवार-कमीज, लहंगे-चुन्नी एवं रेडीमेड कपड़ों पर कढ़ाई का काफी प्रचलन है अत: महिलाएं प्रशिक्षण के बाद हाथ व मशीन द्वारा कढ़ाई का कार्य शुरू कर सकती हैं। मशीन द्वारा स्वेटर चन्द घंटों में तैयार किया जा सकता है अत: महिलाएं इसे आय उपार्जन के लिए अपना सकती हैं।

8.    सिले-सिलाए वस्त्रों का व्यवसाय : आजकल रेडीमेड वस्त्रों का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। ये घर पर सिले वस्त्रों की अपेक्षा ज्यादा सुन्दर व सस्ते होते हैं। महिलाएं थोड़े से धन व स्थान के साथ इस व्यवसाय को शुरू कर सकती हैं।

9.    अन्य व्यवसाय : उपर्युक्त दिए गए व्यवसायों के अतिरिक्त कपड़ों की सिलाई, दरी व खेस इत्यादि बनाना, बेकरी यूनिट खोलना, कलात्मक मूर्तियां बनाना, मुढ्ढे व कूर्सियां इत्यादि बनाना, खिलौने व सजावट की वस्तुएं बनाना व कपड़ों पर पेंटिंग इत्यादि को व्यवसाय के रूप में अपनाकर महिलाएं आय उपार्जन का साधन बना सकती हैं। इन उद्योगों को शुरू करने के लिए सरकार द्वारा ऋण इत्यादि की सुविधा दी जाती है। अत: काम शुरू करने की इच्छुक महिलाएं अपने जिले में स्थित ग्रामीण विकास एजेंसी से सम्पर्क करें व प्रशिक्षण लेने हेतु जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केन्द्रों में गृह विज्ञान विशेषज्ञों से सम्पर्क करें।