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मत्स्य पालन ----- ग्रामीण क्षेत्रों में नई पहल

      मछलियों का निर्धारित संचयित जल में ''युक्तिपूर्ण उत्पादन'' ही मतस्यपालन है, जहां मतस्य पालन व उत्पादन को प्रकृति की दया पर नहीं छोड़ा जाता। मत्स्य पालन प्रक्रिया की तुलना कृङ्ढि एवं पशुपालन से की जा सकती है। उन्नत तकनीक अपनाकर प्राकृतिक तरीके से होने वाले मत्स्य उत्पादन की अपेक्षा निर्धारित जल से तुलनरात्मक रूप से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। मत्स्यापालन की व्यवसायिक रूप् से सफलता मुख्यत: इसके उत्पादन के प्राप्त होने वाले लाभ से आंकी जाती है। मत्स्य पालन का मुख्य लक्ष्य है ''मछली का मानव पौष्टिक भोजन के रूप में उत्पादन लेना है।''

      ग्रामीण क्षेत्रों में कृङ्ढि कार्यों के साथ-साथ आधुनिकतम तकनीक एवं वैज्ञानिक सुझावों को अपनाकर यदि मत्स्यपालन की दिषा में प्रयास किए जाएं तो ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में आष्चर्यजनक सुधार हो सकता है। साथ ही मत्स्य युक्त भोजन से ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य रूप से पाए जाने वाले कुपोङ्ढण को दूर किया जा सकता है, क्योंकि मछली में प्रोटीन, बसा, विटामिन, मिनरल, प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

      एफ.ए.ओ. (1985) की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार तीसरी दुनिया के विकासषील देषों की कुल आबादी की एक तिहाई जनसंख्या में से महिलाओं एवं लड़कियों में ''कुपोङ्ढण'' एक बहुत बड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या है, जो कि मनुष्य की कार्यक्षमता व रोग प्रतिरोधी क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करती है। यहां तक कि इस कमी के कारण मनुष्य की मृत्यु भी सम्भव है। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार मछली में पाए जाने वाले प्रोटीन की मात्रा मुर्गे के मांस में पाए जाने वाली प्रोटीन की मात्रा के समान है, परन्तु दूध, सूअर का मांस व अंडे में पाए जाने वाल प्रोटीन की मात्रा की तुलना से अधिक है।

      वर्तमान में जनसंख्या के निरन्तर बढ़ते दबाव, बेरोजगारी एवं भोजन की कमी के कारण मत्स्य पालन की आवष्यकता को पहल से अधिक महसूस किया जा रहा है। भारत में वर्तमान समय में उपलब्ध 16 लाख हैक्टेयर जलक्षेत्र का केवल 38 प्रतिषत क्षेत्र ही मत्स्य पालन हेतु उपयोग में लाया जा रहा है। जबकि भारत के सबसे बड़े प्रदेष उत्तर प्रदेष में 4.5 लाख है0 जलक्षेत्र झीलों एवं तालाबों रूप में उपलब्ध है। उत्तर प्रदेष के पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन की बहुत अधिक सम्भावना है। इसके बाबजूद वर्तमान समयमें इसमें से बहुत कम क्षेत्र का ही उपयोग मत्स्यपालन हेतु किया जा सका है। सम्भवत: इसके पीछे प्रषिक्षित जनषक्ति कमी, मत्स्यपालन के प्रति जागरूकता का आभाव, एवं मत्स्य बीजों समय पर उपलब्ध न होना मुख्य कारण समझा जाता है।

      मत्स्य पालन से जहां एक ओर आर्थिक व सामाजिक लाभ मिलता है, वहीं इसके अतिरिक्त लाभ भी हैं जैसे -

(क)   ऐसी भूमि जो कृङ्ढि की दृष्टि से लाभदायक न हो, वहां पर तालाब बनाकर, मत्स्यपालन करके आर्थिक लाभ उठाया जा सकता है।

(ख)   ऐसी भूमि जो निरन्तर कृङ्ढि फसलों के कारण व्यर्थ हो गई हो उस भूमि पर मत्स्य कृङ्ढि करने के बाद उसे पुन: उपयोग में लाया जा सकता है।

(ग)   प्राकृतिक रूप से एकत्रित पानी को तालाब का रूप देकर मत्स्य पालन किया जा सकता है।

      तालाब में मछलियों में लिए प्राकृतिक भोजन के साथ-साथ कृत्रिम भोजन की भी पूर्ति कर ''इकोनामिक क्राप'' तालाब से प्राप्त की जा सकती है। कृत्रिम भोजन के अन्तर्गत गांवों में सामान्य रूप से उपलब्ध सोयाबीन एवं सरसों की खली, धान, राई, जौ, गेहूं एवं गोबरगैस से निकल गोबर का भी उपयोग किया जा सकता है। जिससे कृत्रिम भोजन पर आने वाली लागत को 50 प्रतिषत तक कम किया जा सकता है। मत्स्यपालन हेतु मत्स्य बीजों की महत्वपूण्र्ा आवष्यकता होती है। बीजों की मात्रा, गुणबत्ता व समय पर उपलब्धता मत्स्यपालन का सफल बनाने हेतु आवष्यक है। मत्स्य पालन विभाग एवं कृङ्ढि बैंक भी इस कार्य को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। इस कायं हेतु कृङ्ढकों को ऋण्ा आदि की भी सुविधा उपलब्ध है।

मत्स्य पालन की अनेक विधियाँ मत्स्य अनुसंधान केन्द्रों द्वारा विकसित की गई हैं। जिनमें प्रमुखत: मोनोकल्चर एवं पौलीकल्चर है। मोनोकल्चर के तहत एक ही प्रजाति की मछलियों पालन किया जाता है जबकि पौलीकल्चर में एक से अनेक प्रजातियों को पाला जाता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में ठंडे पानी में होने वाली प्रमुखत: रोहू, कतला, नैन, ग्रासकार्प, सिल्वर कार्प तथा कामन कार्प हैं। व्यवसायिक रूप से में पौलीकल्चर ही अधिक लाभदायक होता है। इसके अर्न्तगत तीन प्रजातियों रोहू, नैन एवं कतला 30-40 प्रतिषत अनुपात की मात्रा में पाली जाती है। एक हैक्टेयर हेतु 5000-10,000 अंगुलिकाओं का संचय किया जा सकत है। अन्य कल्चर में सिल्वर कार्प, कामनकार्प एवं ग्रासकार्प का पालन किया जाता है। पौलीकल्चर को अपनाने से 5000 से 6000 कि.ग्रा. मछली प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ङ्ढ का उत्पादन प्राप्त किया जाता है।

वर्तमान में दूनवैली जलागम प्रबन्ध परियोजना के अर्न्तगत इस दिषा में प्रायोगिक तौर पर कोटी गांव में मत्स्य पालन हेतु ग्रामीणों को प्रेरित किया गया है। इस कार्य को षुरू करने में ग्रामीणों द्वारा बहुत उत्साह एवं रूचि प्रकट की गई। अत: वहां पर पषुओं के पीने के लिए एकत्रित जल भण्डार को तालाब का रूप देकर माह जुलाई में इस कार्य को सामूहिक तौर पर गांव में षुरू करवाया गया है। मत्स्य बीज हेतु मत्स्य विभाग से संपर्क कर बीज उपलब्ध करवाये गए।

तालाब में दों प्रकार की मछलियां रोहू एवं कतला के बीज डाले गए थे। दोनों मछलियां अलग-अलग पानी की गहराई में भोजन प्राप्त करती हैं। जिसमें से एक पानी की ऊपरी सतह पर भोजन पाने वाली तथा दूसरी तल से भोजन लेने वाली थी। वर्तमान में ग्राम की जलागम विकास समिति द्वारा ही इनका रखरखाव एवं प्रबन्धन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम से प्ररित होकर व्यक्तिगत रूप से अन्य गांवों के ग्रामीणों द्वारा भी मत्स्य पालन हेतु रूचि दिखाई जा रही है। भविष्य में वृहद स्तर पर मत्स्य विपणन भी किया जा सकता है एवं इससे होने वाली आय से गांव की संसाधन समिति के कोङ्ढ में वृध्दि की जा सकती है।

निष्चित रूप से इस बात का स्वीकार करना पड़ेगा कि मत्स्यपालन एक परिणामदायी आर्थिक वृध्दि कारक एवं खुषहाली तथा नीलका्रन्ति की तरफ ले जाने वाला व्यापारोन्मुख कार्य है। आषा की जाती है कि दूनवैली जलागम प्रबन्ध परियोजना द्वारा इस ओर उपलब्ध कराई जा रही सहायता का ग्रामीणों द्वारा पूर्ण लाभ उठाकर अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार हेतु एक सफल प्रयास किया जा सकेगा।

 

 

भीमताल जलागम द्वारा निर्मित जलापूर्ति योजनाएं - ग्राम सुरंग के लिए वरदान

 

भीमताल जलागम प्रबन्ध परियोजनान्तर्गत विकासखण्ड ओखलकाण्डा में सुदूर स्थित ग्राम सुरंग सूक्ष्म जलागम क्षेत्र सुरगड़ानाला में स्थित है। भीमताल परियोजना द्वारा इस सूक्ष्म जलागम क्षेत्र में वनीकरण, चारागाह, औद्यानिकी, भूमि संरक्षण, कृङ्ढि, पषुपालन व लघुसिंचाई सम्बन्धी कार्य स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी/सहयोग से सराहनीय ढंग से किया जा रहा है एवं ग्रामवासियों को पर्याप्त मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

परियोजना द्वारा जलापूर्ति मद से जलविहीन स्थान में पेयजल एवं सिंचाई योजनाएं बनवाई गई हैं जिनमें से एक योजना का वर्णन यहां किया जा रहा है।

गांव में उपलब्ध 13-14 वर्ङ्ढ पुरानी लगभग 1200 मीटर जीर्णषीर्ण व मृत जी. आई. पाईप लाईन को सक्षम अधिकारी की अनुमति प्राप्त कर ग्रामवासियों द्वारा श्रमदान से उखाड़कर गांव में ही उपलब्ध अन्य जलश्रोत से गांव तक पानी लाने हेतु उक्त पाईप लाईन बिछाई गई। परिणाम स्वरूप गांव में उपलब्ध संसाधनों व ग्रामवासियों के श्रमदान से जलविहीन बिन्दु तक 29-11-94 को पानी पहुंच गया। इतना कार्य ग्राम संगठन/ग्रामवासियों द्वारा करने के उपरान्त भीमताल जलागम परियोजना द्वारा पेयजल डिग्गी, सिंचाई हौज व पेयजल वितरण हेतु 15 मि.मी. जी. आई. पाईप बिछाने का कार्य किया गया है। योजना का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि सर्वप्रथम पानी पेयजल डिग्गी में एकत्र होता है तथा ओवरफलो का पानी सिंचाई हौज में एकत्र होता है। इस प्रकार पेयजल व सिंचाई की संविधा साथ-साथ उपलब्ध है। सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने के पष्चात् लगभग 15 परिवार आलू, प्याज, फरासबीन, अदरक व अन्य फसलें व सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। वर्तमान सम में पेयजल डिग्गी से भी परिवारों के घरोें में पेयजल संयोजन के फलस्वरूप  पर्याप्त मात्रा में पेयजल, स्नानघर व षौचालय हेतु पानी उपलब्ध है। सिंचाई हौज भरा मिलता है जिससे कृङ्ढक बारी-बारी से तकरीबन 6-7 हैक्टेयर भूमि में सिंचाई करते हैं। इस योजना से इस जगह विषेङ्ढ कर चतुर्मुखी विकास के साथ-साथ प्रत्येक घर में षौचालय निर्माण से पर्यावरण में भी सुधार हुआ है। अब औसतन प्रत्येक परिवार का नकदी फसलों से प्रतिवर्ङ्ढ लगभग 5 हजार रूपयों का आर्थिक लाभ हो रहा है।

भविष्य में योजना के रखरखाव हेतु प्रत्येक माह प्रति परिवार रू. 5.00 जमा होता है जो कि सिंचाई एवं पेयजल समूह के अध्यक्ष एवं सचिव के सयुंक्त खाते में जमा है अब हमें भविष्यत में योजना के रखरखाव हेतु किसी विभाग पर निर्भर रहने की आवष्यकता नहीं है। इस प्रकार परियोजना को विकास की दृष्टि से वरदान कहा जाए ता अतिष्योक्ति न होगी।