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किसानों में वृक्षों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए फसलों के साथ-साथ तथा मेंड़ों पर फल एवं बहुपयोगी वृक्षों के उगाने की प्रथा धीरे-धीरे प्रचलित हो रही है, जिसे ''कृषिवानिकी'' कहते हैं। कृषिवानिकी भूमि प्रबन्ध की एक ऐसी पद्वति है जिसके अर्न्तगत एक क्षेत्र पर कृषि फसलों एवं बहुउद्देषीय वृक्षों, झाड़ियों, फल-वृक्षों के साथ-साथ पषुपालन को लगातार या क्रमबद्व विधिसे किया जाता है तथा भूमि की उपजाऊ क्षमता का बढ़ाया जाता है।

किसान की घनिष्ट सहयोगी उसकी पत्नी, बेटी या माँ होती है। ग्रामीण महिला पुरूष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खेतखलिहान में रोजाना 8 से 9 घन्टे खेती-बाड़ी के अनेक कार्यों में हाथ बंटाकर अपने परिवार का बोझ हल्का करती है। ग्रामीण महिलाएं पुरूष के काम में 60 से 70: सहायता करती है। लक्ष्मी देवी (1986) ने पाया कि ग्रामीण महिलाओं को रोजाना कार्य करने का औसत समय 13 से 15 घण्टे है। विष्वविख्यात कृषि वैज्ञानिक डा. एम. एस. स्वामीनाथन लिखते हैं कि इतिहासकारों का मानना है कि नारी से ही सर्वप्रथम खाद्यान फसलों के पौधों को अपनाया और घरेलू बनाया। जब पुरूष भोजन की तलाश पर षिकार पर जाते तो नारी घर के आसपास से बीज इक्कट्ठा कर बो दिया करती थी और इस प्रकार खाद्यान फसलों को अपनाने का कार्य हुआ।

हमारे देश भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाएं मुख्य कार्यबल हैं। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार महिलाओं की संख्या 406.38 मिलियन है जो कि कुल जनसंख्या का 48.15: है। इसका 75: हिस्सा ग्रामीण महिलाओं का है। वर्ष 1991 की जनगणना एवं महिला श्रमिकों की संख्या 27.5 मिलियन थी। कृषि में आर्थिक रूप से क्रियाषील महिलाओं का 4/5 हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराता है। वास्तविकता में ग्रामीण महिलाओं के विकास की लगातार अनदेखी हो रही है। लेकिन वर्तमान में कुछ प्रयास षुरू हुए हैं जिससे ग्रामीण महिलाओं के चौतरफा विकास की सम्भावनाएं बढ़ी हैं।

बुन्देलखण्ड, जो कि उत्तर प्रदेश के 7 जिलों क्रमश: झाँसी, ललितपुर, जालौन, बाँदा, हमीरपुर, महोबा और कर्बी तथा मध्य प्रदेश के 6 जिलों क्रमश: दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह तथा सागर में फैला हुआ वर्षा पर आधारित क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र की मिट्टी प्राय लाल काली है। लाल मिट्टी के दो प्रकार हैं - राकड़ पड़वा तथा काली मिट्टी भी दो प्रकार की है - काबर और मार। बुन्देलखण्ड का वन क्षेत्र 1.21 मिलियन हैक्टेयर है।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जमीन में कंकरीली, पथरीली तथा चट्टानों की बाहुल्यता है। सिंचाई के साधन मात्र कुंए हैं। इस क्षेत्र के किसानों की सामाजिक आर्थिक स्थ्िति बहुत कमजोर है। बुन्देलखण्ड में ग्रामीण जनसंख्या 9.81 मिलियन है, जिसका 45.7: ग्रामीण महिलाएं हैं। ग्रामीण महिलाओं का योगदान घर परिवार से लेकर खेत खलिहान तक अमूल्य है। अत: वर्तमान अध्ययन में ग्रामीण महिलाओं की कृषिवानिकी में भागीदारी तथा जागरूकता पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

वर्तमान षोध कार्य में निम्नलिखित दो उद्देशयों का अध्ययन किया गया है

 

·        ग्रामीण महिलाओं की कृषिवानिकी में भागीदारी का अध्ययन करना।

·        कृषिवानिकी के बारे में ग्रामीण महिलाओ की जागरूकता का अध्ययन।

 

उपरोक्त उद्देशयों के अतिरिक्त कृषिवानिकी से सम्बन्धित समस्यायें, नीतिगत मुद्दे, प्रसार कार्यक्रम तथा ग्रामीण महिला एवं कुटीर उद्योग पर विषेश सूचना को एकत्र करना भी इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण भाग है।

 

विधि

      वर्तमान अध्ययन झाँसी जिले के ग्राम पलींदा में किया गया। ग्राम पलींदा के चयन का मुख्य कारण यह है कि इस गाँव में राष्ट्रीय कृषिवानिकी अनुसंधान केन्द्र, झाँसी द्वारा किसान मेला एवं किसान गोष्ठी का आयोजन कराया जा चुका है तथा गाँव में प्रदेश सरकार तथा गैर सरकारी संगठनों (एन. जी. ओ.) द्वारा स्वजल परियोजना एवं अन्य कार्य किए गए हैं। अत: गाँव में कृषकों एवं ग्रामीण महिलाओं तथा युवाओं को कुछ सीमा तक अनुभव है, जिससे जो ऑंकड़े मिलेंगे उनमें काफी हद तक विष्वसनीयता रहेगी।


 

प्रतिदर्ष

      ग्राम पलींदा जिला झाँसी के 100 महिलाओं के प्रतिदर्ष को रैन्डम चयन द्वारा लिया गया। ग्रामीण महिलाओं से ऑंकड़े व्यक्तिगत साक्षात्कार द्वारा एकत्र किए गए। साक्षात्कार के लिए महिलाओं को चयन करते समय सभी प्रकार के पक्षपातों को दूर किया गया ताकि सही जबाव मिलें।

खेती-बाड़ी में महिलाओं की भागीदारी

      ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक स्तर पर मुख्यत: पाया गया कि ज्यादातर महिलाएं मध्यम आयु वर्ग (35-40 वर्ष) की थीं। पढ़ाई लिखाई पा्रथमिक स्तर से नीचे थी, जबकि ज्ययदातर अषिक्षित थीं, सयुंक्त परिवार की सदस्या थीं एवं उनका साकाजिक व आर्थिक स्तर भी नीचे था। ग्रामीण महिलाओं में मनोवैज्ञानिक लक्षण जो पाए गए उनमें मध्यम आय कमाने की रूचि, कुछ पाने की ललक, परिवार का लालन-पालन, निजी निर्भरता एवं परिवर्तन के लिए आन्तरिक इच्छा की प्रधानता थी।

      अध्ययनो से पता चलता है कि ग्रामीण महलाएं खेती-बाड़ी के कार्यों में काफी हद तक पुरूष के साथ भागीदारी करती हैं जैसा कि सारणी 1 में दिया है। कुछ गतिविधियों जैसे खाद बनाना एवं खाद डालना, बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई-मड़ाई, भंडारण एवं जगल से लकड़ी एवं चारा इकट्ठा करने में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 50 से 100: है। इसके अतिरिक्त बीज उपचार, उर्वरक डालना, पक्षियों से रखवाली करने में भी महिलाओं की भागीदारी सार्थक पाई गई। इसके बाद के बचे समय को महिलाएं अपने घरेलू कार्य जैसे बच्चों का लालन-पालन, खाना बनाना, घर की सफाई एवं सामाजिक कार्यों में भाग लेना आदि में लगाती हैं। भारतीय गाँवों में ग्रामीण् महिलाओं के बारे में ऐसे ही ऑंकड़े चक्रवर्ती (1975) ने भी एकत्र किए थे।


 

सारणी-1 खेती-बाड़ी में महिलाओं की भागीदारी  गतिविधियाँ

प्रतिशत भागीदारी

खाद बनाना एवं डालना

बीज उपचार

बुवाई

उर्वरक डालना

निराई-गुड़ाई

पक्षियों से रखवाली

कटाई एवं मड़ाई

भंडारण

ज्ंगल से लकड़ी एवं चारा इकट्ठा करना

100

38

89

18

99

28

100

52

42

 

कृषिवानिकी के प्रति जागरूकता

      ग्रामीण महिलाओं की कृषिवानिकी के प्रति जागरूकता को सारणी-2 में दिखाया गया है। ऑंकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि कृषिवानिकी शब्द ग्रामीण महिलाएं पहली बार सुनी थी लेकिन कृषिवानिकी के घटकों से वे भलीभाँति परिचित हैं। उनसे यह प्रष्न पूछा गया कि क्या आप कृषिवानिकी जानती है या किसे कहते हैं तो शत प्रतिशत उत्तर ''नहीं'' मिला, लेकिन जब कृषिवानिकी के बिन्दुओं को समझाया गया तो उसमें ग्रामीण्ा महिलाओं ने जागरूकता का अच्छा उत्तर दिया। कृषिवानिकी के कुछ घटकों जैसे पर्यावरण सुधार, वृक्षों का दवा के रूप में प्रयोग, ईंधन, लकड़ी, चारा तथा फलों की प्राप्ति के प्रति जागरूकता 50 से 79 प्रतिशत पाई गई। जबकि पेड़ों से वङ्र्ढा का निर्भर होना, मृदा उर्वरता बढ़ाना एवं मृदा क्षरण का कम होना, पौधषाला सम्बन्धी जानकारी एवं मेंड़ों पर वृक्षें को लगाने की जागरूकता 31-47 प्रतिशत पाई गयी तथा फसलों के साथ वृक्ष लगाने की जागरूकता मात्र 8 प्रतिशत पाई गई। अत: ग्रामीण महिलाओं को फसलों के साथ वृक्ष उगाने के प्रति जागरूक करने की आवष्यकता है। ग्रामीण महिलाएं नियमित जंगलात में जाती हैं तथा वहां वे पत्तियाँ, र्इंधन की लकड़ी, चारा, फल, महुआ, शहद तथा गोंद इकट्ठा करती हैं। र्इंधन की लकड़ी इकठ्ठा करने के लिए सप्ताह में 3 दिन जंगलात में जाती हैं। औसतन एक महिला एक दिन में 20-25 रूपए की र्इंधन की लकड़ी इकट्ठा करती हैं।

 

कृषिवानिकी सम्बन्धित समस्याएं

      ग्रामीण महिलाओं द्वारा कृषिवानिकी से सम्बन्धित समस्याओं का जब जिक्र किया गया तो उनके विचार से सिंचाई जल की कमी, बैंक से कर्ज न मिलना, जमीन का न होना, बाढ़ की व्यवस्था न होना, छुठ्टा जानवरों द्वारा चरने की समस्या, बाजार की कमी, अच्छे वृक्षों की पौध उपलब्ध न होना, र्इंधन की लकड़ी बेचने में दिक्कत, अषिक्षा, सरकारी विभागों की उदासीनता मुख्य समस्याएं सामने आईं। इसके अलावा ग्रामीण महिलाओं ने उनके तथा परिवार के स्वास्थ्य की समस्याओं का भी उल्लेख किया जिसको विभागीय कार्य से दूर किया जा सकता है।

नीतिगत मुद्दे

      कृषिवानिकी विस्तार कार्यक्रम की प्रणाली में अधिकतर कार्यकर्ता पुरूङ्ढ वर्ग से हैं तथा महिलाओं की संख्या बेहद कम है जबकि कृषि उत्पादन में 60 प्रतिशत कृषि क्रियाएं महिलाओं द्वारा ही की जाती है। इसलिए गाँव की साक्षर कृषक महिलाएं जिनमें नेतृत्व प्रदान करने के गुण हैं, उन्हें प्रषिक्षण दिया जाए तो वे गाँव के स्तर पर कृषिवानिकी विस्तार का कार्य कर सकती हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के कार्यक्रम में सहभागिता सुनिष्चित की जा सकती है।

 

सारिणी-2 ग्रामीण महिलाओं की कृषिवानिकी के प्रति जागरूकता

कृषिवानिकी के बिन्दु एवं उपयोग

जागरूकता (प्रतिशत में)

 

पर्यावरण सुधार

52

पेड़ों से वर्षा का निर्भर होना

31

वृक्षो का दवा के रूप में प्रयोग

65

ईंधन, लकड़ी, चारा तथा फल

79

मृदा उर्वरता, क्षरण

36

पौधषाला सम्बन्धी

23

मेंड़ पर वृक्ष लगाना

47

फसलों के मध्य वृक्ष लगाना

8

प्रसार कार्यक्रम

      ग्रामीण महिलाओ के लिए भी विस्तार कार्यक्रमों, जैसे रेडियो, गोष्ठियों, महिला दिवसों का आयोजन, प्रक्षेत्र भ्रमण, महिला एवं बाल स्वास्थ्य षिविर, महिला कृषकों को जानकारी एवं प्रषिक्षण पोषण वाटिकाओं की स्थापना एवं वन महोत्सव, महिला समूहों का गठन एवं संचालन द्वारा उन्हें नए कृषिवानिकी ज्ञान की जानकारी देकर प्रषिक्षित किया जाए तो कृषिवानिकी की ग्रामीण महिलाओं के लिए लाभकर बनाया जा सकता है।

ग्रामीण महिलाएं एवं कुटीर उद्योग

      ग्रामीण महिलाएं कुटीर उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। कुटीर उद्योगों के लिए कागज, रबर, मोम, शहद, फर्नीचर, कृषि यंत्र हेतु लकड़ी, लाख, रंग एवं वार्निश, कत्था, छालें, बाँस की टोकरिया, जड़ी-बूडियाँ तथा फल की आपूर्ति करती हैं। अत ऐसे कार्यक्रमों के प्रबन्धन में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी एवं जागरूकता से इन कुटीर उद्योगों का तो विकास होगा ही, साथ ही साथ ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।

 

निष्कर्ष

      कृषक महिलाओं की जागरूकता एवं सहभागिता से कृषिवानिकी प्रबन्धन में महत्वपूर्ण सहयोग मिलने की सम्भावनाएं हैं। बगैर परमिट के लक्रड़ी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने पर भी प्रतिबन्ध है, जिससे ग्रामीण महिलाओं का बड़ी कठिनाईयाँ उठानी पड़ती हैं और ये मजबूर होकर यह लकड़ी तथा अन्य उत्पाद ठेकेदारों को बेच देती हैं। अत: सरकार को इन मुद्दों पर विषेश ध्यान देना होगा। सहभागी प्रबन्धन जिसमें ग्रामीण महिलाओं की विभिन्न पहलुओं जैसे नीति निर्धारण, योजना क्रियान्वयन एवं लाभांश में यदि उचित भागीदारी की जाय तो कृषिवानिकी के कार्यक्रमों को गाँव, विकास खण्ड, तहसील तथा जिला स्तर पर सफल बनाने में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।