dde
4f6

गेंदा बहुत ही उपयोगी एवं आसानी से उगाया जाने वाला फूलों का पौधा है। यह मुख्य रूप से सजावटी फसल है। यह खुले फूल, माला एवं भू-दृश्य के लिए उगाया जाता है। मुर्गियों के दाने में भी यह पीले वर्णक का अच्छा स्त्रोत है। इसके फूल बाजार में खुले एवं मालाएं बनाकर बेचे जाते है। गेंदे की विभिन्न ऊॅंचाई एवं विभिन्न रंगों की छाया के कारण भू-दृश्य की सुन्दरता बढ़ाने में इसका बड़ा महत्व है। साथ ही यह शादी-विवाह में मण्डप सजाने में भी अहम् भूमिका निभाता है। यह क्यारियों एवं हरबेसियस बॉर्डर के लिए अति उपयुक्त पौधा है। इस पौधे का अलंकृत मूल्य अवि उच्च है क्योंकि इसकी खेती वर्ष भर की जा सकती है। तथा इसके फूलों का धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में बड़ा महत्व है। हमारे देश में मुख्य रूप से अफ्रीकन गेंदा और फ्रे्रच गेंदा की खेती की जाती है।

 

मृदा (मिट्टी)

      गेंदे की खेती विभिन्न प्रकार की मृदा में की जा सकती है। वैसे गहरी मृदा उर्वरायुक्त मुलायम जिसकी नमी ग्रहण क्षमता उच्च हो तथा जिसका जल निकास अच्छा हो उपयुक्त रहती है। विशेष रूप से बलुई-दोमट मृदा जिसका पी.एच. 7.0-7.5 हो सर्वोतक रहती है।

 

जलवायु

      गेंदे की खेती संपूर्ण भारतवर्ष में सभी प्रकार की जलवायु में की जाती है। विशेषतौर से शीतोषण और सम-सीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। नमीयुक्त खुले आसमान वाली जलवायु इसकी वृध्दि एवं पुष्पन के लिए बहुत उपयोगी है लेकिन पाला इसके लिए नुकसानदायक होता है। इसकी खेती सर्दी, गर्मी एवं वर्षा तीनों मौसमों में की जाती है। इसकी खेती के लिए 14.5-28.6 डिग्री सैं. तापमान फूलों की संख्या एवं गुणवत्ताा के लिए उपयुक्त है जबकि उच्च तापमान 26.2 डिग्री सैं. से 36.4 डिग्री सैं. पुष्पोत्पादन पर विपरीत प्रभाव डालता है।

किस्मों का चुनाव

 

1.    अफ्रीकन गेंदा

      पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, अलास्का, एप्रिकॉट, बरपीस मिराक्ल, बरपीस ह्नाईट, क्रेकर जैक, क्राऊन ऑफ गोल्ड, कूपिड़, डबलून, फ्लूसी रफल्स, फायर ग्लो, जियाण्ट सनसेट, गोल्डन एज, गोल्डन क्लाइमेक्स जियान्ट, गोल्डन जुबली, गोल्डन मेमोयमम, गोल्डन येलो, गोल्डस्मिथ, हैपिनेस, हवाई, हनी कॉम्ब, मि.मूनलाइट, ओरेन्ज जूबली, प्रिमरोज, सोबेरेन, रिवरसाइड, सन जियान्ट्स, सुपर चीफ, डबल, टेक्सास, येलो क्लाइमेक्स, येलो फ्लफी, येलोस्टोन, जियान्ट डबल अफ्रीकन ओरेन्ज, जियान्ट डबल अफ्रीकन येलो इत्यादि।

      हाइब्रिड्स : अपोलो, क्लाइमेक्स, फर्स्ट लेडी, गोल्ड लेडी, ग्रे लेडी, मून सोट, ओरेन्ज लेडी, शोबोट, टोरियडोर, इन्का येलो, इन्का गोल्ड, इन्का ओरेज्न इत्यादि।

 

2.    फ्रेन्च गेंदा

     (अ)   सिंगल : डायण्टी मेरियटा, नॉटी मेरियटा, सन्नी, टेट्रा रफल्ड रेड इत्यादि।

     (ब)   डबल : बोलेरो, बोनिटा, बा्रउनी स्कॉट, बरसीप गोल्ड नगेट, बरसीप रेड एण्ड गोल्ड, बटर स्कॉच, कारमेन, कूपिड़ येलो, एल्डोराडो, फोस्टा, गोल्डी, जिप्सी डवार्फ डबल्, हारमनी, लेमन ड्राप, मेलोडी, मिडगेट हारमनी, ओरेन्ज फ्लेम, पेटाइट गोल्ड, पेटाइट हारमनी, प्रिमरोज क्लाइमेक्स, रेड ब्रोकेड, रस्टी रेड, स्पेनिश ब्रोकेड, स्पनगोल्ड, स्प्री, टेन्जेरीन, येलो पिग्मी इत्यादि।

 

खाद्य एवं उर्वरक

      सड़ी हुई गोबर की खाद           : 15-20 टन प्रति हैक्टेयर

      यूरिया                   : 600 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

      सिंगल सुपर फास्फेट             : 1000 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

      म्यूरेट ऑफ पोटाश               : 200 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

      सारी सड़ी हुई गोबर की खाद, फास्फोरस, पोटाश व एक तिहाई भाग यूरिया को मृदा तैयार करते समय अच्छी तरह मिला लें तथा यूरिया की बची हुई मात्रा का एक हिस्सा पौधे खेत में लगाने के 30 दिन बाद व शेष मात्रा उसके 15 दिन बाद छिड़काव करके प्रयोग करें।

 

बीज शइया तैयार करना: गेदे की पौध तैयार करने के लिए बीज शइया तैयार करें, जो कि भूमि की सतह से 15 सैं.मी. ऊॅंची होनी चाहिए ताकि जल का निकास ठीक ढंग से हो सके। बीज शइया की चौड़ाई 1 मीटर तथा लंबाई आवश्यकतानुसार रखें। बीज बुवाई से पूर्व बीज शइया का 0.2 प्रतिशत बाविस्टीन या कैप्टान से उपचारित करें ताकि पौधे में बीमारी न लग सके और पौध स्वस्थ रहे।

 

बीजों की बुवाई : अच्छी किस्मों का चयन कर बीज शइया पर सावधानीपूर्वक बुवाई करें। ऊपर उर्वर मृदा की हल्की परत चढ़ाकर, फव्वारे से धीरे-धीरे पानी का छिड़काव कर दें।

 

 बीज दर : 800 ग्राम से 1 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर बीजों का अंकुरण 18 से 30 डिग्री सैं. तापमान पर बुवाई के 5-10 दिन में हो जाता है।

 

बुवाई का समय

पुष्पन ऋतु         बीज बुवाई का समय       पौध रोपण का समय

वर्षा         मध्य - जून        मध्य - जुलाई

सदी         मध्य - सितम्बर          मध्य - अक्तबर

गर्मी         जनवरी - फरवरी          फरवरी - मार्च

 

पौध रोपण : अच्छी तरह तैयार क्यारियों में गेंदे के स्वस्थ पौधों को जिनकी 3-4 पत्तियां हों पौध रोपण हेतु प्रयोग करें। जहां तक संभव हो पौध रोपाई शाम के समय ही करेुं तथा रोपाई के पश्चात् चारों तरफ मिट्टी को दबा दें ताकि जड़ों में हवा न रहं एवं हल्की सिंचाई करें।

 

पौधे से पौधे की दूरी

1-                अफ्रीकन गेंदा : 45 गुणा 45 सैं.मी. या 45 गुणा 30 सैं.मी.

2-               फ्रेन्च गेंदा : 20 गुणा 20 सैं.मी. या 20 गुणा 10 सैं.मी.

सिंचाई

      गेंदा एक शाकीय पौधा है। अत: इसकी वानस्पतिक वृध्दि बहुत तेज होती है। सामान्य तौर पर यह 55-60 दिन में अपनी वानस्पतिक वृध्दि पूरी कर लेता है तथा प्रजनन अवस्था में प्रवेश कर लेता है। सर्दियों में सिंचाई 10-15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मियों में 5-7 दिन के अंतराल पर करें।

 

 

वृध्दि नियामकों का प्रयोग

      पौधों की रोपाई के चार सप्ताह बाद एस ए डी एच का 250-2000 पी.पी.एम. पर्णीय छिड़काव करने से पौधों में समान वृध्दि पौधे में शाखाओं के बढ़ने के साथ ही फूलों की उपज व गुणवत्ताा भी बढ़ती है।

पिंचिंग (शीर्ष कर्तन)

      पौधे के शीर्ष प्रभाव को खत्म करने के लिए पौध रोपाई के 35-40 दिन बाद पौधों को ऊपर से चुटक देना चाहिए जिससे पौधों की बढ़वार रूक जाती है। तने से अधिक से अधिक संख्या में शाखाएं प्राप्त होती है तथा प्रति इर्का क्षेत्र में अधिक से अधिक मात्रा में फूल प्राप्त होते हैं।

खरपतावार नियंत्रण

      खरपतवार पौधों की उपज व गुणवत्ताा पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। क्योंकि खरपतवार मृदा से नमी व पोषण दोनों चुराते हैं तथा कीड़ो एवं बीमारियों को भी शरण देते हैं। अत: 3-4 बार हाथ द्वारा मजदूरों से खरपतवार निकलवा दें तथा अच्छी गुढ़ाई कराएं।

      खरपतवारों का रासायनिक नियंत्रण भी किया जा सकता है। इसके लिए एनिबेन 10 पौण्ड, प्रोपेक्लोर और डिफेंनमिड़ 10 पौंड प्रति हैक्टेयर सुरक्षित एवं संतोषजनक है।

फूलों की तुड़ाई : पूरी तरह खिले फूलों को दिन के ठण्डे मौसम में यानि कि सुबह जल्दी या शाम के समय सिंचाई के बाद तोड़े ताकि फूल चुस्त एवं दूरुस्त रहें।

पैकिंग : ताजा तोड़े हुए फूलों को पॉलीथीन के लिफाफों, बांस की टोकरियों या थैलों में अच्छी तरह से पैक करके तुरंत मण्डी भेजें।

उपज : अफ्रीकन गेंदें से 20 - 22 टन ताजा फूल तथा फेंच गेंदे से 10 - 12 टन ताजा फल प्रति हैक्टेयर औसत उपज प्राप्त होती है।

कीट एवं व्याधियां

1-                रेड स्पाइडर माइट : यह बहुत ही व्यापक कीड़ा है। यह गेंदे की पत्तियों एवंत ने के कोमल भाग से रस चूसता है। इसके नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत मैलाथियान या 0.2 प्रतिशत मेटासिस्टॉक्स का छिड़काव करें।

2-               चेपा : ये कीड़े हरे रंग के, जूं की तरह होते हैं और पत्ताों की निचली सतह से रस चूसकर काफी हानि पहँचाते हैं। चेपा विषाणु रोग भी फैलाता है। इसकी रोकथाम के लिए 300 मि.ली. डाईमैथोएट (रोगोर) 30 ई.सी. या मैटासिस्टॉक्स 25 ई.सी. को 200-300 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। यदि आवश्यकता हो तो अगला छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करें।

व्याधियां व रोकथाम

1-                आर्द्र गलन : यह बीमारी नर्सरी में पौध तैयार करते समय आती है। इसमें पौधे का तना गलने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कैप्टान या बाविस्टिन के घोल की डे्रचिंग करें।

2-               पत्ताों का धब्बा व झुलसा रोग : इस रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तिायों के निचले भाग भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं जिसकी वजह से पौधों की बढ़ावर प्रभावित होती है। इसकी रोकथाम के लिए डायथेन एम. के 0.2 प्रतिशत घोल का

15-20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

3-               पाऊडरी मिल्डयू : पत्तिायों के दोनों तरफ व तने पर सफेद चूर्ण तथा चकते दिखाई देते हैं। जिसकी वजह से पौधा मरने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील सल्फर (सल्फैक्स) एक लीटर या कैराथेन 40 इ.सी. 150 मि.ली. प्रति हैक्टेयर के हिसाब से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

 

खरीफ प्याज की फसल

      प्याज का प्रयोग सलाद के रूप में, कच्चे तथा पकाकर कई तरह से, शाकाहारी एवं माँसाहारी भोजन बनाने में, अचार, पाऊडर व फ्लेक्स आदि बनाने में होता है। इसके अलावा प्याज का बहुत सी दवाइयां बनाने के प्रयोग में लाया जाता है। रबी फसल के अतिरिक्त प्याज को खरीफ मौसम में भी लगाया जा सकता है।

उन्नत किस्में

1-                एन-53 (निपाद-53) : यह खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली एक प्रसिध्द किस्म है। इसके कन्द चमकीले, गहरे लाल रंग के, गोल आकार के, मध्यम से बड़े आकार के तथा कम तीखे स्वाद वाले होते हैं। यह किस्म 140-150 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज लगभग 90-100 क्ंविटल प्रति एकड़ है व इसकी भण्डारण क्षमता कम होती है।

2-               एग्रीफांऊड डार्क रेड (ए.डी.आर.) : इसके शल्क, कंद गहरे लाल रंग के, ग्लोब आकार के, 4-6 सैं.मी. व्यास वाले व मध्यम तीखे होते हैं। इसमें तीखापन निपाद-53 से अधिक होता है। यह किस्म तकरीबन 140-150 दिनों में पक कर तैयार होती है। भण्डारण क्षमता मध्यम तथा इसे खरीफ मौसम के लिए पूरे भारत वर्ष में उगा सकते हैं। औसत पैदावार 110-120 क्ंविटल प्रति एकड़।

भूमि की तैयारी

      खेत की 2-3 जुताइयां करने व पाटा चलाने के बाद सममतल क्यारियां या डोलियां और पानी देने वाली नालिया बनाएं।

बिजाई का समय व बीज की मात्रा

      खरीफ फसल की बिजाई पौध या गोठियों (सेट) दोनों से की जा सकती है।

1-    गंठिया तैयार करना :

गंठियां तैयार करने के लिए बीज को जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक बीजा जा सकता है।

     बीज की मात्रा: 3-4 किलोग्राम प्रति एकड़।

2. पौध तैयार करना:

   बिजाई का समय : मध्यम जून।

   बीज की मात्रा : 5-6 किलोग्राम प्रति एकड़।

पौध तैयार करते समय सावधानियां

1-     नर्सरी पानी के स्त्रोत के नजदीक हो।

2-    पौधशाला ऊॅंची व छायादार जगह पर होनी चाहिए ताकि पौध का अधिक धूप, गरम हवा व अधिक वर्षा से बचाया जा सके।

3-    नर्सरी की क्यारियां भी उठी हुई बनाएं।

4-    पौधों को दिन के समय अधिक गर्म हवा या तेज धूप से बचाने के लिए घास-फूस या सरकंडे आदि का छप्पर या टाटी बनाएं।

5-    खरीफ प्याज की नर्सरी में आर्द्र गलन रोग की समस्या आ सकती है। इसलिए नर्सरी में बीजोपचार और पौध उपचार कैप्टान व थीराम (2 प्रतिशत प्रति किलोग्राम बीज) दवा से करें।

 

 

गंठियों को पौधशाला से निकालना व उनका रख-रखाव

      गंठियों को अप्रैल के अंतिम सप्ताह से मई के प्रथम सप्ताह तक पौधशाला से निकाला जाता है व इसके बाद पत्तिायों को गर्दन के ऊपर 2-3 सैं.मी. छोड़कर काटा जाता है। रोग रहित गंठियों (1.5-2 सैं.मी. आकार की लगभग 10 से 15 ग्राम) को छांट कर टोकरियों या पतले टाट के थैलों में भरकर हवादार कमरों में भण्डारण किया जाता है। बहुत छोटी गंठियों से पैदावार कम पाई गई है। एक एकड़ के लिए लगभग 5-6 क्ंविटल गंठियां काफी होती हैं।

रोपाई

1.    पौध वाली फसल

      कतारों की दूरी - 15 सैं.मी.

      कतारों में पौधों की दूरी - 10 सैं.मी.

2.    गंठियों से फसल

      प्याज की गंठियों को डोलियों (30-40 सैं.मी. फासले पर) के दोनों तरफ 10 सैं.मी. के फासले पर लगाएं।

      खेत में पौध या गंठियों की रोपाई के तुरन्त बाद सिंचाई दें।

खाद व उर्वरक

      खेत तैयार करते समय 10-12 टन गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी खाद प्रति एकड़ के हिसाब से डालें व 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 15 किलोग्राम फास्फोरस और 10 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ उपयुक्त होती है। नाइट्रोजन की लगभग आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पहले डालें। नाइट्रोजन का शेष भाग दो बार बराबर-बराबर मात्रा में 30-40 दिनों के अन्तराल पर खड़ी फसल में डालें। नाइट्रोजन डालते समय खेत में नमी का होना अति आवश्यक है।

सिंचाई

      इस फसल की सिंचाइयां मौसम अनुसार करनी चहिएं। यदि अगस्त से अक्तूबर तक वर्षा नहीं होती तो 8-10 दिनों के अन्तराल पर पानी दें। लेकिन कन्दों की बढ़वार शुरू हाने पर पानी देने का अन्तराल कम कर दें।

खरपतवार नियन्त्रण

      दो-तीन निराई-गोड़ाई के साथ रासायनिक खरपतवार नियंत्रण लाभदायक हैं। फ्लुक्लोरालिन 400-500 ग्राम प्रति एकड़ (बासालीन 45 प्रतिशत 0.9-1.1 लीटर) को रोपाई के समय छिड़काव करके मिट्टी में मिलाते हैं या पैन्डीमैथालिन 400-500 ग्राम प्रति एकड (स्टोम्प 30 प्रतिशत 1.3-1.7 लीटर) का छिड़काव रोपाई के 8-10 दिन बाद, जब पौधे व्यवस्थित हो जाते हैं और खरपतवार निकलने शुरू हो जाते हैं करना चाहिए। इस दवाई का घोल एक एकड़ फसल के छिड़काव करन के लिए 250 लीटर पानी में बनाएं। छिड़काव करते समय उल्टा चलना चाहिए।

फसल की कटाई (खुताई)

      नवम्बर के अंतिम सप्ताह से लेकर मध्य दिसम्ब तक कंद खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं। कंदों के आकार व रंग को जांच कर फसल तैयार होने का अंदाजा लगाया जा सकता है।

      खुदाई के 15 दिन पहले पानी बंद कर दें व पत्तिायों को पैरों से गिरा दें। प्याज को खुदाई के बाद एक सप्ताह तक खेत में रखकर सुखाएं। पत्ताों को सुखाने के बाद गर्दन से 3-5 सैं.मी. छोड़कर अलग करें व 3.5 दिन तक फिर सुखाएं।

उपज :      80 -100 क्ंविटल प्रति एकड़।